जगन्नाथ पुरी: भक्तिभाव और पर्यटन का सर्वोत्तम स्थान

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पुरी के जगन्नाथ मंदिर जाने और उनके अद्भुत स्वरूप के दर्शन करने की इच्छा बचपन से बलवती थी। एक बार भुवनेश्वर जाने का मौका भी मिला था। लेकिन हालात इस कदर अनुकूल नहीं थे और मैं चाहकर भी वहां जा नहीं पाया। दोबारा यह मौका मुझे लगभग दो साल के बाद मिला।

हालात इस बार भी आपाधापी से भरा था लेकिन इस बार मेरी मनोकामाना पूर्ण करने के लिए मेरे अग्रज और अत्यंत प्रिय वरिष्ठ भ्राता श्री बिरेंद्र दीक्षित ने यह कमान संभाल रखी थी। उन्होंने कहा- ‘इस बार भगवान के दर्शन होंगे आपको, इसलिए आप भुवनेश्वर आईए और यही से दिल्ली जाईए’। मेरी वर्षों की इस इच्छा को सहयोग मिल रहा था लिहाजा भगवान जगन्नाथ के दर्शन की लालसा और उत्सुकता में उत्कंठा के पर लग रहे थे। हिंदू धर्म में यूं तो भगवान को पाने की कई सीढ़िया है। नवधा (नौ प्रकार की) भक्ति का जिक्र पुराणों में आता है लेकिन भक्ति मार्ग सबके उत्कृष्ट रूप में शुमार किया जाता है। आस्था अपने सर्वोच्च स्वरूप में भाव के नए आयाम को प्रकट करती और गढ़ती है। भाव का गहराई से भरा स्वरूप भक्ति की विविध सीढ़ियों को क्रमश: तय करता है। हिंदू धर्म के कुछ पुराणों के अलावा गीता भी यही कहती है ईश्वर के धाम पर किसी भी श्रद्धालु का आगमन बिना उसकी मर्जी के नहीं होता।

जैसे-जैसे वक्त नजदीक आता गया मेरी खुशियों को पंख लग रहे थे और फिर वो दिन भी आ गया जिस दिन पुरी में स्थित महाप्रभु यानी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए मुझे जाना था। 1 मई की सुबह व्याकुलता से भरी थी जिसमें ना जाने कितनी उत्सुकताओं और इच्छाओं का समावेश था। भुवनेश्वर से जगन्नाथ पुरी जाने के लिए 60 किलोमीटर का रोड से सफर यूं तो लगभग सवा या डेढ़ घंटे में पूरा होता है। लेकिन यह कैसे बीता मुझे पता भी नहीं चला। भगवान जगन्नाथ के नवकलेवर (नया शरीर) उत्सव के दौरान पिछले साल काफी बेहतरीन रास्ता यहां बनाया गया है जिससे सफर की थकान का बिल्कुल भी पता नहीं चलता। सिर्फ एक ब्रिज को छोड़कर पूरे रास्ते का निर्माण किया गया है और इससे बनने के बाद से भुवनेश्वर से पुरी की यात्रा श्रद्धालुओं और भक्तों के लिए सहज हो गई है।

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रास्ते के दोनों तरफ की हरियाली का दौर कब खत्म हो गया और गाड़ी पुरी में दाखिल भी हो गई। रविवार का दिन होने की वजह से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। पार्किंग में गाड़ियों की कतार से श्रद्धालुओं की जमावड़ा का सहज ही अंदाजा लग रहा था। एक जगह जूते जमा करवाने के बाद जब जमीन पर पैर रखा तब तपतपाती जमीन का अहसास हुआ। 42 डिग्री का तापमान और गर्म हवाओं के थपेड़े श्रद्धालुओं के उत्साह को डिगा नहीं पा रहे थे। मंदिर में प्रवेश से पहले यह दिख रहा था कि यहां श्रद्धालु देश के कई हिस्सों से आए हैं। कुछ विदेशी लोग भी मंदिर के बाहर दिखे। कुछ विदेशी कैमरे में तस्वीरों को कैद करते दिख रहे थे।
इस बीच मंदिर के मुख्य द्वार की सीढ़ियों पर मैं दर्शन के लिए चढ़ा। अचानक पैरों के नीचे शीतलता का अहसास हुआ। पैरों की जलन शांत हो गई जो काफी देर तक तपतपाती जमीन पर पैर रखने की वजह से हो रही थी। सीढ़ियों पर मंदिर प्रबंधन की तरफ से श्रद्धालुओं के लिए की गई यह व्यवस्था मुझे बेहद अच्छी लगी। दरअसल मंदिर की सीढ़ियों पर ऊपर से नीचे की तरफ धीरे-धीरे पानी आ रहा था। पानी की वजह से पैरों की जलन बंद हो गई और श्रद्धालुओं के लिए यह चिलचिलाती गर्मी में राहत का काम कर रही थी। सीढ़ियों के हर हिस्से पर पानी धीरे-धीरे आ रहा था। साथ ही श्रद्धालुओं के सीढ़ियों पर चलने के दौरान संतुलन नहीं बिगड़े इसके लिए मोटी-मोटी रस्सियां भी लगाई गईं थी।

मंदिर के मुख्य द्वार से भगवान जगन्नाथ के गर्भगृह तक पहुंचने का सफर उत्सुकता से भरा था जिसमें सिर्फ सात मिनट का वक्त लगा। मंदिर में आरती के बाद दर्शन का वक्त था लिहाजा श्रद्धालु हर तरफ नजर आ रहे थे। लगातार बज रही घंटियां, पंडितों के मंत्रोच्चार की ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। जय महाप्रभु और जय जगन्नाथ के जयकारों से मंदिर का कोना-कोना गूंज रहा था। इस बीच भगवान जगन्नाथ की गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा मैंने देखी। मेरे ठीक सामने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति ठीक दांईं तरफ, बीच में उनकी बहन सुभद्रा और सबसे बाईं तरफ उनके ज्येष्ठ भ्राता बलभद्र की प्रतिमा। तीन पंडित वहां बैठे थे जो किसी पारंपरिक रस्म और पूजा से संबधित विधि-विधान को अंजाम दे रहे थे।

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ऐसी पौराणिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और श्रीकृष्ण का युगल स्वरूप है। श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के ही अंश स्वरूप हैं। इसलिए भगवान जगन्नाथ को ही पूर्ण ईश्वर माना गया है। तभी उन्हें जगन्नाथ (जगत के नाथ) यानी संसार का नाथ कहा जाता है। ‘जगन्नाथ’ ‘जगत नाथ’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ ‘ब्रह्मांड का भगवान’ होता है। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा की जाती है। देवताओं की यह मूर्तियां लकड़ी से बनी हैं। हर 12,15 या 17 साल के बाद इन लकड़ी की मूर्तियों को पवित्र पेड़ों की लकड़ी के साथ बदला जाता है। हर समारोह में इन मूर्तियों की प्रतिकृति तैयार की जाती है। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा सबसे दाई तरफ स्थित है। बीच में उनकी बहन सुभद्रा की प्रतिमा है और दाई तरफ उनके बड़े भाई बालभद्र (बलराम) की तस्वीर है।
यह नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। यह वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। पुरी का उल्लेख सर्वप्रथम महाभारत के वनपर्व में मिलता है। इसके बाद कूर्म पुराण, नारद पुराण, पद्मम पुराण में इस क्षेत्र की पवित्रता का विस्तार से वर्णन मिलता है। आध्यात्मिक विजय यात्रा पर निकले शंकराचार्य ने यहां एक पीठ की स्थापना की थी जिसे गोवर्धन पीठ के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। उसके बाद पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र धारण करते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण दिशा में स्थित रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ यानी जगन्नाथ।
मंदिर में प्रवेश से पहले ठीक दाई तरफ आनंद बाजार और बायी तरफ पवित्र महाप्रभु की महारसोई है। दरअसल मंदिर में भगवान जगन्नाथ को जो भोग लगाया जाता है उसका प्रसाद इसी रसोई में बनता है। दरअसल यहां दो प्रकार का महाप्रसाद बनता है सूखा और गीला। मंदिर की रसोई में एक विशेष कमरा है जहां भगवान के महाभोग के लिए महाप्रसाद को बनाया जाता है। भगवान जगन्नाथ के महाभोग के बाद यह महाप्रसाद आनंद बाजार में बेहद कम दाम में बिक्री के लिए उपलब्ध होता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 से ज्यादा भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को रोजाना पकाए जाने वाले भोजन का भोग लगाया जाता है। साथ ही यहां निर्मल्य भी मिलता है। दरअसल एक गुलाबी कपड़े में लपेटा और धागे से सिले हुए निर्मल्य में चावल के दाने होते है। ऐसी मान्यता है कि इस निर्मल्य को घर के भंडार गृह, पूजा गृह और तिजोरी में रखना बेहद शुभ होता है और इससे अमुक घर में धन-धान्य की हमेशा वृद्धि होती है और उस घर का भंडार कभी खाली नहीं होता। पुरी के इस महारसोई के बारे में भी यही कहा जाता है कि यहां का भंडार कभी खाली नहीं होता। जबकि यह महाप्रसाद रोजाना लाख से भी ज्यादा भक्त ग्रहण करते हैं । यहां मिलने वाले प्रसाद को महाप्रसाद कहा जाता है और उसे आप अगर ग्रहण नहीं करते है तो यह महाप्रभु का अपमान माना जाता है और ऐसा शायद ही कोई करना चाहेगा। दरअसल निर्मल्य भी एक तरह से महाभोग ही है जो भगवान पर चढ़ाया जाता है। संक्षेप में महारसोई में महाप्रभु के लिए महाभोग बनाया जाता है, फिर उसका भगवान पर भोग लगाए जाने के बाद श्रद्धालुओं को महाप्रसाद के रुप में प्राप्त होता है। इसलिए यहां प्रसाद नहीं बल्कि उसे महाप्रसाद कहा जाता है। महाप्रभु के महाप्रसाद को ग्रहण करने का अलौकिक महत्व माना जाता है।

भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए मंदिर में चार दरवाजों से आप जा सकते हैं। उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम में चार द्वार है जिसके जरिए श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए प्रवेश करते है। चार दिशाओं के दरवाजों के अलावा एक और दिलचस्प बात भगवान जगन्नाथ से जुड़ी है जो काफी कम लोग जानते हैं। दरअसल पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान जगन्नाथ ने अपनी रक्षा के लिए हनुमान जी को नियुक्त किया है। इसके बाद से चारों दिशाओं में यहां भगवान हनुमान विराजमान है जो उत्तर, पूर्व, दक्षिण और उत्तर दिशाओं में स्थित होकर प्रभु जगन्नाथ की रक्षा करते हैं।
ऐसी पौराणिक मान्यता है कि तीन बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने हनुमानजी को यहां समुद्र को नियंत्रित करने के लिए नियुक्त किया था, लेकिन जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। फिर इसका फायदा उठाते हुए समुद्र कहर बरपा कर मंदिर को तोड़ जाता था।

मंदिर के पश्चिम दिशा में है बेड़ी हनुमान मंदिर। यह जंजीर से बंधा एक हनुमान मंदिर है और समुद्र तट के नजदीक स्थित एक छोटा सा मंदिर है जो पुरी के चक्र नारायण मंदिर की पश्चिम दिशा की ओर बना है। इसे दरिया महावीर मंदिर भी कहा जाता है। दरिया का अर्थ होता है समुंद्र जो महावीर भगवान हनुमान का दूसरा नाम है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। भगवान जगन्नाथ ने हनुमान जी को पुरी की रखवाली का जिम्मा सौंपा था। दरअसल महाप्रभु ने ऐसा समुंद्र के प्रकोप से खुद को बचाने के लिए किया। लेकिन हनुमान जी भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के दर्शन का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे और वह नगर में प्रवेश कर जाते थे। उसके बाद समुद्र का पानी शहर में प्रवेश कर मंदिर को क्षतिग्रस्त कर गया। भविष्य में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भगवान जगन्नाथ ने हनुमान को सोने की जंजीरों से बांध दिया और उन्हें दिन-रात सतर्क रहने का आदेश दिया। इसलिए इनका नाम बेड़ी हनुमान मंदिर पड़ा।

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यह वर्णन कुछ पुराणों में भी मिलता है कि पुरी धाम की सदियों से रक्षा भगवान हनुमान करते है क्योंकि यह जिम्मेदारी उन्हें भगवान जगन्नाथ ने सौंपी है। श्री जगन्नाथ मंदिर के उत्तरी भाग में भी हनुमान महाप्रभु के रक्षक के रूप में विराजमान है। भगवान हनुमान के इस स्वरूप को चारी चक्र और अष्ठ भुजा हनुमान कहते हैं। चारी चक्र का मतलब हुआ कि हनुमान सुरक्षा की खातिर चार चक्र को धारण करते हैं। अष्ठ भुजा यानी वो हनुमान जो आठ भुजाओं से युक्त हैं। हनुमान जी के चार हाथ में सुदर्शन चक्र, 2 हाथ प्रणाम की मुद्रा में और 2 हाथ से तालियां बजाते हुए वह भगवान जगन्नाथ के नाम की निरंतर स्तुति करते हैं। इसी प्रकार बाकी दो दिशाओं में भी भगवान हनुमान का यहां प्राचीण मंदिर है जो महाप्रभु के रक्षक के रुप में विराजमान है।

जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कई चमत्कार है जो इसे अद्भुत मंदिर की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं। इस मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते हुए नजर नहीं आते। जबकि दूसरे कई मंदिरों के आसपास पक्षियों का बसेरा होता है लेकिन यहां ऐसा नहीं है। सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत होता है, लेकिन पुरी में ठीक इसका उल्टा होता है। ज्यादातर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है। श्री जगन्नाथ मंदिर दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर माना जाता है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के नजदीक खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना नामुमकिन है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है और नजर नहीं आती है। श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यह एक रहस्य है । निश्चित तौर पर यह एक आश्चर्यजनक तथ्य भी है। रोजाना शाम के वक्त मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर भगवान शंकर का चंद्र बना हुआ है। ध्वज काफी दूर से दिखता है।

 

पुराणों में पुरी को धरती का वैकुंठ कहा गया है। यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और फिर यह चार धामों में से एक धाम बना।

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां बिमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है। फिलहाल जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिशा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं। मंदिर सिर्फ एक पत्थर से बना और तराशा गया है। एक पत्थर से बनाए गए इस मंदिर की वास्तु और शैली अद्भुत है। इस मंदिर को कलिंग वास्तु शैली में बनाया गया है। मंदिर चारों तरफ से 20 फीट ऊंची दीवार से घिरा है। इस मंदिर के आस-पास कई छोटे-छोटे मंदिर बने हैं।

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मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद तीन चीजें दिल को छू गई। पहला कुछ छोटे-बड़े बंदर मंदिर परिसर में खेल-कूद कर रहे थे। वह मुख्य मंदिर के पत्थरों पर भी बैठे दिखे। यकीन मानिए उन बंदरों के शरीर के रंग से जगन्नाथ मंदिर के पत्थरों का रंग बिल्कुल मैच कर रहा था। काफी ध्यान से देखने पर यह पता चल रहा था कि वहां बंदरों का एक झुंड अठखेलियां कर रहा है। पता ही नहीं चल रहा था कि वहां बंदर बैठे है। मंदिर परिसर में ही दर्शन के बाद एक जगह पर लोग दीए जलाकर मन्नत मांगते और प्रार्थना करते है। दीए आप वहीं से खरीद सकते है और इसके लिए वहां कई दुकानें है। मैंने भी दीए जलाए। तपती गर्मी के बीच तेज हवाएं भी चल रही थी लेकिन दीए की लौ तेल के खत्म नहीं होने तक अनवरत जलती रही। इस दौरान मैंने एक व्यक्ति को वहां तमिल भाषा में प्रार्थना करते और भाव-विह्वल होकर रोते हुए देखा। मंदिर दर्शन के बाद लोग यहां दीए जलाकर भगवान की तरफ मुख कर प्रार्थना करते हैं। साथ ही यहां से चंद फीट की दूरी पर एक हरे रंग दीवार से टिककर लोग भगवान की तरफ देखते और प्रार्थना करते है। इसके बाद भगवान से लोग विदाई लेते है। मैंने भी विदाई ली इस उम्मीद के साथ कि मैं आपके (भगवान जगन्नाथ के) दर्शन करने जल्द ही आउंगा। ‘आप फिर कब मुझे बुलाएंगे।’ मंदिर परिसर से काफी दूर जाने के बाद भी घंटा-घड़ियाल, शंखनाद की गूंज कानों में गूंज रही थी। यकीनन मेरी यह धार्मिक यात्राओं में सबसे अविस्मरणीय और अद्भुत यात्रा थी।

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