छठ के महापर्व 2018 : नहाए-खाए के पर्व से हुई शुरुआत, अब खरना में दिखेगी श्रद्धालुओं की आस्था


चार दिनों तक मनाए जाने वाले छठ महापर्व का आज यानी कि सोमवार को दूसरा दिन है. ये छठ का महापर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व के दूसरे दिन खरना किया जाता है. खरना का अर्थ है शुद्धिकरण करना. घर को शुद्ध रखना तो होता ही है इसके साथ ही अपने मन को शुद्ध रखने से भी खरना का अर्थ है. व्रती नहाय-खाय से पर्व की शुरुआत करते हैं जिसमें एक समय का भोजन किया जाता है और फिर दूसरे दिन इसकी पूर्णता खरना करके करते हैं.

इस दिन व्रतधारी दिनभर उपवास करते हैं और शाम में भगवान सूर्य को खीर-पूड़ी, पान-सुपारी और केले का भोग लगाने के बाद खुद खाते हैं. यह व्रत काफी कठिन होता है.  इस पूरी प्रक्रिया में नियम का विशेष महत्व होता है. शाम में प्रसाद ग्रहण करने के समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि कहीं से कोई आवाज नहीं आए. ऐसा होने पर खाना छोड़कर उठना पड़ता है.

पंचमी तिथि को खरना के दिन व्रती शुद्ध अंतःकरण से कुलदेवता और सूर्य के साथ-साथ छठ मैय्या की पूजा कर गुड़ से बनी खीर अर्पण करते हैं या फिर नैवेद्य अर्पित करते हैं और इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं. आपको बता दें कि आमतौर पर छठ पर्व को बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ एक इलाकों में लोग मनाते हैं.

इस पर्व में साक्षात भगवान भाष्कर यानी सूर्य की आराधना की जाती है. कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. इस पर्व में व्रती दो दिनों तक निर्जल व्रत रहते हैं. रविवार को नहाय-खाय, सोमवार को खरना, मंगलवार को खष्ठी के दिन अस्तांचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और फिर बुधवार को सप्तमी की प्रातकाल में सूर्योदय के समय अर्घ्य दिया जाएगा. उसके बाद प्रसाद वितरण कर व्रती भोजन ग्रहण करेंगे.

खासकर जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर रही होती है और कोई आवाज हो जाती हो तो खाना वहीं छोड़ना पड़ता है और उसके बाद छठ के खत्म होने पर ही वह मुंह में कुछ डाल सकती है. इससे पहले एक खर यानी तिनका भी मुंह में नहीं डाल सकती इसलिए इसे खरना कहा जाता है.

साभार : पल-पल इंडिया

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